बरसों पहले तुम बंद आँखों का ख़्वाब बन कर मिलते थे...
मैं नींद में पल-पल जीती थी उस ख़्वाब को
फिर आँखें खोल देती थी
कि पता था....
ख़्वाब कभी सच नहीं होते कभी.....,
हाँ....., शुक्र ज़रूर मनाती थी कि
कम से कम ख़्वाब में तो पा लेती हूँ तुम्हें !
अब बरसों बाद तुमसे जागते हुए मिली हूँ...
सामने हूँ तुम्हारे....
देख रही हूँ.....सुन रही हूँ तुम्हें....
अपने पास........बहुत पास......,
ये बात और कि
तुम अब भी एक ख़्वाब ही हो....
जागी आँखों का ख़्वाब ........,
और अब......
नींद टूट जाने का भी कोई रास्ता नहीं
कि मुद्दतों से जाग ही रही हूँ मैं...,
तो अब उलझी हूँ हर लम्हा
इस सवाल में...
कि इस जागते ख़्वाब के जादू से बाहर कैसे निकलूँ....?
कि निकलना तो होगा ही......!
कि ख़्वाब की हकीकत तो अब भी वही है......!!
कि ख़्वाब तो अब भी सच नहीं होते.......!!!
- प्रतिमा -
जो कुछ एकान्त में, एकान्त के ही लिये रचा गया हो, उसे सबके सामने यूं व्यक्त कर पाना बडा ही कठिन कार्य है . लेकिन कभी किन्हीं मुखर एकान्त के मौन पलों में अनजाने ही जन्मे भाव को भी अधिकार है कि वो अपनी उपस्थिति दर्शा सके.यही सोचते हुये अपनी इन टूटी-फूटी, आधी-अधूरी भावनाओं के पुलिन्दे को कविता के रूप में आपके सामने रखने का दुस्साहस कर रही हूं.आप इसे कविता मानें ये आग्रह कदापि नहीं है क्योंकि मैं खुद भी आज तक इन्हें ”कविता” नहीं मान सकी. हां, ये मन से मन का संवाद है जो कविता का लिबास ओढे हुये है.
PANKHURI

कुछ आखर-कुछ पन्ने
Saturday, March 30, 2013
Wednesday, January 9, 2013
सूरज मेरे.........!!!!!!
दिखो या न दिखो....,
मुझे पता है कि तुम हो !
इस घने कोहरे के पार, अपारदर्शी धुंध के पीछे
मेरे मन की सारी अनिश्चितताओं.....शंकाओं.....
असमंजस और अन्यमनस्कताओं के परे,
शाश्वत....अडिग....निरंतर प्रज्ज्वल तुम हो वहीँ,
जहाँ रहते रहे हो अनंत काल से !
इधर मैं तुमसे दूर
अपने मन की शीत में घिरी...,
थरथराती....काँपती....
हिमांश सी जमती,
देख रही हूँ राह उस क्षण के आने की...,
जिस क्षण प्रकृति का एक चक्र पूरा होगा
और हम हमेशा की तरह मिलेंगे !
जिस क्षण तुम्हारे ताप से पिघल जायेगा
मेरी देह पर....,मन पर....,
रोम-रोम पर जमा हिम
सारा का सारा....,
स्वेद-कणों में बदल जायेगी ठिठुरन सारी...
तुम्हारे दीप्त आलोक में घुल जायेगा सारा कुहास.....,
और इस अमृत-प्रतीक्षा का क्षण-क्षण
जगा रहा है मुझमें
एक नवसौन्दर्यमय नवारम्भ की अदम्य आस...
क्योंकि
जब तक यह जीवन है,
तब तक
जन्म और मृत्यु की तरह
तुम्हारा होना और तुम्हारा आना भी
अटल.....शाश्वत सत्य है
सूरज मेरे.........!!!!!!
- प्रतिमा -
(Photo Courtesy : my friend Vinay Tripathii)
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