PANKHURI

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कुछ आखर-कुछ पन्ने

Monday, April 23, 2012

शब्द-मछेरे...!!


वो 
फेंक कर शब्द-जाल
पकड़ते हैं भावनाओं की मछलियाँ...
छोटी-बड़ी,
रंग-बिरंगी,
चमकीली-चटखीली,
भावनाएं....
फँस जाती हैं 
शब्द मछेरे के शब्द जाल में...
और फिर
जाल तनते ही खींचा जाने लगता है
जीवन के रेतीले,
सूखे-गीले, पथरीले सागर तट पर....

देखते ही देखते
सारी भावनाएं
शब्द जाल से उलट कर आ पड़ती हैं
तपती रेत पर
पहले मरने....
फिर बाज़ार में बिक जाने के लिए...! 


जी हाँ...बाज़ार.....
जहां 
मरी हुई भावनाओं की तय की जाती हैं...
ऊंची कीमतें,
लगायी जाती हैं बड़ी बोलियाँ ,
घटाए-जोड़े जाते हैं 
नफे-नुकसान के 
झूठे-सच्चे आंकड़ें,

और इस पूरी आपाधापी में 
सूखी रेत पर छटपटा कर मरने वाली 
भावनाओं के बारे में कोई नहीं सोचता....
क्योंकि 
सोच लेने से ठिठक कर रुक जाने का ख़तरा है...
और
रुक जाने से जीवन नहीं चलता...

जीवन तो चलता है व्यापार से...
नित कुछ नया हासिल करने से...
कुछ बेचने...कुछ खरीदने,
कुछ कमाने से...

तो इसीलिए 
शब्द-मछेरे का व्यापार खूब चलता रहता है...
फिर सांझ ढलती है,
फिर दिन निकलता है,
डाले जाने लगते हैं फिर से 
शब्द-जाल...

इसी तरह...
जीवन चलता जाता  है...
भावनाएं मरती जाती हैं....!!! 

Wednesday, April 18, 2012


उदासी....
तुम्हारा पता क्या है ????
किधर छुप कर रहती हो तुम
सारा दिन...,
और 
कहाँ से अचानक निकल कर 
चली आती हो शाम होते ही 
मेरे ज़ेहन के आँगन में 
बिन बताये बिन बुलाये मेहमान की तरह ....

इतना ही नहीं.....
तुम आकर बैठती  भी  नहीं
किसी एक जगह
शरीफ़  लोगों की तरह 
कुछ देर बैठ कर वापस चले जाने के लिए...
पसार लेती  हो अपना वजूद 
मन के एक कोने से दूसरे कोने तक....  
कि
किसी और के बैठने की जगह ही नहीं बचती 
ख़ुद मेरे लिए  भी नहीं....,
अपनी गठरी-पोटली 
सब खोल कर 
उलट डालती हो मेरे चारों ओर 
इस  कदर  
कि
उनसे निकल पाना मुश्किल हो जाता है
देर रात गए तक...

उदासी ...
तुम्हारी ये आदत 
अब
मेरे सहन की सीमा से बाहर जा रही है...
किसी दिन
तोड़ दूँगी तुम्हारा मुँह
फ़ेंक दूँगी उठा कर 
सारा साजोसामान तुम्हारा
मन से बाहर बहुत दूर ...
निकल बाहर करुँगी तुम्हें अपनी ज़िन्दगी से 
बिना किसी लिहाज के....,

फिर न कहना ...
चेताया न था....!!!

Monday, April 16, 2012

उम्मीद की तासीर...



तुम मिल गए हो तो बस
समझ लूँ ...
आने वाली है सुबह,
होने  वाले हैं उजाले,
मान लूँ.... 
मेरी हिस्से के सूरज ने भी 
खोल दी हैं
अपनी आँखें,
पसार दी हैं 
अपनी बाहें,
कर लिया है अपना रुख
मेरी बे-उजाला किस्मत की ओर...,
और इसी उम्मीद से
जी जाऊं एक बार फिर.... 
कि
उम्मीद की तासीर...
 यकीन से ज़ियादा होती है...!!!


'' मैं '' प्रतिमा ....

Monday, November 2, 2009

(5)

उसने चुपके से मुझे याद किया है शायद ... !
फिर मेरे जेहन की तन्हाई में ,
रूह का साज़ बज उठा है कहीं ,
उड़ती फिरती सी तितलियों की तरह ,
धड़कनें भी मेरे काबू में नहीं ,
उसने चुपके से मुझे याद किया है शायद ... !
फिर से कौंधी है कोई बिजली सी ,
फिर कोई लौ सी थरथराई है ,
फिर मेरी नज़रें चौंक उट्ठी हैं ,
जैसे आवाज़ कोई आई है ,
उसने चुपके से मेरा नाम लिया है शायद ... !


"प्रतिमा "

Tuesday, October 13, 2009

(4)

कर लेती हूँ मैं
तुमसे ढेरों बातें ,
तमाम दूरियों के बावजूद ...!
तुम्हारे पास होने के लिए
मुझे नहीं महसूस होती ज़रूरत
तुम तक जाने की ... !
अलग रह कर भी तुम्हारा एहसास रहता है
हमेशा मेरे पास ...!
अपनी खुशियाँ,
आँसू ,
व्यस्तता ,
अकेलापन ,
और भी जाने कितना कहा -अनकहा ,
बाँट लेती हूँ तुमसे ,
इतनी दूर रह कर भी ... !
सच दोस्त ,
तुम मुझे कभी ख़ुद से जुदा महसूस ही नही होते ,
शायद
इसी का नाम दोस्ती है ... !

Monday, October 5, 2009

(3)

तुम्हें महसूस करना चाहती हूं ।
मैं अब हद से गुज़रना चाहती हूं ।
जो अच्छा या बुरा है ,पास मेरे ,
तुम्हारे नाम करना चाहती हूं ।
तुम्हारी रूह के गहरे अंधेरे -
उजालों में उतरना चाहती हूं ।
सितारे तुमने जो बिखरा दिए हैं ,
उन्हें पलकों में भरना चाहती हूं ।
दुखों की उम्र जी ली है बहुत , अब ,
खुशी की मौत मरना चाहती हूं ।

(इस ब्लाग की सभी रचनाएं लेखिका की मौलिक एवं निजी कृति है। कृपया इनका अन्य कहीं इस्तेमाल न करें।)

मैं 'प्रतिमा '

Friday, September 11, 2009

(2)

ये सहरा किस कदर, फैला हुआ है ।
समंदर का मुझे ,धोखा हुआ है ।
तू उसकी खिलती मुस्कानों पे मत जा ,
वो अन्दर से बहुत टूटा हुआ है ।
पटकती है लहर, सिर साहिलों पर ,
ये मंजर मेरा भी, देखा हुआ है ।
बनेगी बात कैसे अब हमारी ,
ये धागा , बेतरह उलझा हुआ है ।

''मैं '' प्रतिमा !!!!!!!!!