PANKHURI

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कुछ आखर-कुछ पन्ने

Friday, September 11, 2009

(2)

ये सहरा किस कदर, फैला हुआ है ।
समंदर का मुझे ,धोखा हुआ है ।
तू उसकी खिलती मुस्कानों पे मत जा ,
वो अन्दर से बहुत टूटा हुआ है ।
पटकती है लहर, सिर साहिलों पर ,
ये मंजर मेरा भी, देखा हुआ है ।
बनेगी बात कैसे अब हमारी ,
ये धागा , बेतरह उलझा हुआ है ।

''मैं '' प्रतिमा !!!!!!!!!

Monday, August 31, 2009

(1)

सदाए दिल को फिजाओं में बिखर जाने दो ।
उदास रात की तकदीर संवर जाने दो ।
ग़मों के बोझ को कब तक उठाये रखोगे ,
अब तो पत्थर को कलेजे से उतर जाने दो ।
फूल की तरह इनसे खुशबुएँ भी उठेगीं ,
पहले ज़ख्मों को ज़रा और निखर जाने दो ।
कैसे तुम रोकोगे , उड़ते हुए परिंदे को ,
मन की मर्ज़ी है , वो जाता है जिधर , जाने दो ।
''मैं'' प्रतिमा ...