PANKHURI

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Monday, October 5, 2009

(3)

तुम्हें महसूस करना चाहती हूं ।
मैं अब हद से गुज़रना चाहती हूं ।
जो अच्छा या बुरा है ,पास मेरे ,
तुम्हारे नाम करना चाहती हूं ।
तुम्हारी रूह के गहरे अंधेरे -
उजालों में उतरना चाहती हूं ।
सितारे तुमने जो बिखरा दिए हैं ,
उन्हें पलकों में भरना चाहती हूं ।
दुखों की उम्र जी ली है बहुत , अब ,
खुशी की मौत मरना चाहती हूं ।

(इस ब्लाग की सभी रचनाएं लेखिका की मौलिक एवं निजी कृति है। कृपया इनका अन्य कहीं इस्तेमाल न करें।)

मैं 'प्रतिमा '

Friday, September 11, 2009

(2)

ये सहरा किस कदर, फैला हुआ है ।
समंदर का मुझे ,धोखा हुआ है ।
तू उसकी खिलती मुस्कानों पे मत जा ,
वो अन्दर से बहुत टूटा हुआ है ।
पटकती है लहर, सिर साहिलों पर ,
ये मंजर मेरा भी, देखा हुआ है ।
बनेगी बात कैसे अब हमारी ,
ये धागा , बेतरह उलझा हुआ है ।

''मैं '' प्रतिमा !!!!!!!!!